इस्लामिक बैंक और फाइनेंस: दुनिया में उभरती हुई एक नई अर्थव्यवस्था
आलमी सतह पर इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस एक तेज़ी से उभरता हुआ क्षेत्र है, जो मुस्लिम देशों के अलावा यूरोप में भी अपनी जड़ें मज़बूत कर रहा है। ये ना सिर्फ़ मुसलमानों बल्कि गैर मुस्लिम इन्वेस्टर्स और ग्राहकों में भी लोकप्रियता हासिल कर रहा है।
इस्लामिक फाइनेंस की बुनियाद शरीयत के सिद्धांतों पर आधारित है जो नैतिकता, पारदर्शिता और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देता है। इस्लामिक फाइनेंस ब्याज़ (रिबा) को हराम करार देता है और इसमें ब्याज़ का लेनदेन बिल्कुल बंद होता है। तो चलिए समझते हैं इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस के बारे मैं
इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस क्या है
इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस, आलमी सतह पर तेज़ी से उभरती हुई एक इस्लामी अर्थव्यवस्था है जो शरीयत के क़ानूनों के तहत काम करती है। ये रिबा, घरर, जुआ, शराब, नशा और इस जैसी तमाम हराम चीज़ों को प्रतिबंधित करता है और रिबा यानी ब्याज़ के लेने और देने पर भी पाबंदी लगाता है।
इस्लामिक बैंकिंग की मुख्य विशेषताएं
1. ब्याज़ पर पाबंदी:- इस्लाम में ब्याज़ का लेना और देना दोनों ही हराम हैं इसलिए इस्लामिक बैंकिंग में ब्याज़ के लेनदेन पर पाबंदी होती है और इसकी जगह मुदरबा और मुशरका को अपनाया जाता है जिसमें फ़ायदे और नुकसान को आपस में बांट लिया जाता है।
2. संपत्ति आधारित लेनदेन:- इस्लामिक फाइनेंस में लेनदेन किसी actual property से जुड़ा होता है जिसमें सट्टेबाजी और अनिश्चितता कम होती है।
3. निवेश:- इस्लामिक बैंक उन क्षेत्रों में निवेश नहीं करते जो शरीयत के मुताबिक हराम होते हैं जैसे शराब, तंबाकू, जुआ या हथियार आदि।
4. जोखिम साझेदारी:- दूसरे बैंकों में जहां क़र्ज़ देने वाले को ब्याज़ मिलता है वहीं इस्लामिक बैंकिंग में बैंक और ग्राहक दोनों नफ़ा और नुकसान आपस में साझा करते हैं।
इस्लामिक बैंकिंग के फीचर्स
• मुदारबा:- ये एक तरह की साझेदारी है जिसमें एक पक्ष पैसा लगाता है और दूसरा पक्ष अपनी क़ाबिलियत से उस पैसे का इस्तेमाल करता है और प्रॉफिट को बांट लिया जाता है और नुक़सान पैसे लगाने वाले का होता है जब तक कि मुदारिब यानी दूसरे पक्ष की गलती या लापरवाही की वजह से नुकसान ना हुआ हो।
• मुशारका:- मुशारका में दो या दो से ज़्यादा पार्टनर्स होते हैं जो किसी बिज़नस में पैसा लगाते हैं और नफ़े और नुकसान को पहले से तय फीसद के तहत बांट लिया जाता है। इसमें सभी पार्टनर्स पैसा लगाते हैं।
• मुराबहा:- इसमें बैंक किसी प्रॉपर्टी को खरीदकर ग्राहक को लागत और प्रॉफिट के मार्जिन के साथ बेचता है।
• इजारा:- ये एक तरह का leasing model है, इसमें बैंक किसी प्रॉपर्टी को खरीदकर किराए पर देता है।
• सुकूक:- सुकूक एक इस्लामिक बॉन्ड होता है जो किसी प्रॉपर्टी या परियोजना से जनरेट की गई इनकम के आधार पर इन्वेस्टर्स को रिटर्न देता है।
आलमी सतह पर इस्लामिक बैंक और उसकी लोकप्रियता
इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम 1970 के दशक में मशरिक़ ए वुस्ता में शुरू हुआ और आज इस्लामिक बैंकिंग का दायरा ना सिर्फ़ मुस्लिम देशों में बल्कि ये दुनिया के 70 से ज़्यादा देशों में फैल चुका है जिसमें गैर मुस्लिम देश भी शामिल हैं।
सऊदी अरब, मलेशिया, यूएई, और क़तर जैसे देश इस्लामिक बैंकिंग में आगे हैं। आलमी सतह पर इस्लामिक फाइनेंस की वैल्यू 2023 तक तकरीबन 4 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंच चुकी है और 2025 में ये आंकड़ा 5 ट्रिलियन डॉलर को पार कर सकता है।
गैर मुस्लिम देशों में यूके, सिंगापुर, हॉन्गकॉन्ग में भी इस्लामिक फाइनेंस की मांग बढ़ रही है। लंदन ने इस्लामिक सुकूक जारी करने में अहम किरदार अदा किया। कुछ मग़रिबी बैंक जैसे HSBC और स्टैंडर्ड चार्टर्ड इस्लामिक बैंकिंग सर्विस दे रहे हैं।
इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस का लचीलापन लोगों को इसकी तरफ़ खींच रहा है।
भारत में इस्लामिक फाइनेंस का मुस्तकबिल
भारत में इस्लामिक बैंकिंग की अभी शुरुआत है, भारत में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी के चलते इस्लामिक बैंकिंग की मांग भी बढ़ सकती है। हालांकि कुछ इस्लामिक NBFCs भी चल रहे हैं लेकिन वो अभी छोटे लेवल पर काम कर रहे हैं। इस्लामिक बैंकिंग का बिना ब्याज़ वाला मॉडल भारत में लोगों को प्रभावित कर सकता है और जिससे लोन लेने वालों के लिए चुकाने में आसानी होगी। इसके अलावा भी इसका इस्लामिक बैंकिंग जो पैसे भी इन्वेस्ट करेगी वो हेल्थ, टेक्नोलॉजी, फूड और इन जैसी बेहतरीन कंपनियों में इन्वेस्ट करेगी जिससे देश में पॉजिटिव रिस्पॉन्स जायेगा।
निष्कर्ष
इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस ना सिर्फ़ फाइनेंशियल सिस्टम है बल्कि ये एक नैतिक और सामाजिक नज़रिया भी है जो समाज कल्याण के लिए भी एक अहम किरदार अदा करता है। इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस सिस्टम दुनिया में एक बदलाव ला सकता है और एक पॉजिटिव रिस्पॉन्स क्रिएट कर सकता है। इसके लचीलेपन और बिना ब्याज़ के लेनदेन और पार्टनरशिप सिस्टम की वजह से सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं गैर मुस्लिम भी इससे मुतास्सिर होकर इसमें इन्वेस्ट करने के लिए आगे आते हैं। यही वजह है के इस्लामिक बैंकिंग पूरी दुनिया में फैलता जा रहा है। ये अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है।
फीडबैक
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